January 25, 2026
25 Jan 25
  • डॉ. सिन्हा ने संविधान को राष्ट्र की “सामूहिक चेतना” बताया।
  • कर्तव्यों के ईमानदार निर्वहन को बताया सच्चा देशप्रेम।
  • दिव्यांगजनों के लिए सम्मान और समान अवसर की वकालत।
  • आधुनिक विज्ञान और प्राचीन ज्ञान के समन्वय पर दिया जोर।

संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक समावेश पर डॉ. रीतेश सिन्हा का विशेष संदेश

नई दिल्ली: 77वें गणतंत्र दिवस के गौरवशाली अवसर पर प्रख्यात विचारक और सामाजिक सुधारक डॉ. रीतेश सिन्हा ने राष्ट्र के नाम एक अत्यंत प्रेरणादायक और विचारोत्तेजक संदेश जारी किया है। अपने संदेश में उन्होंने 26 जनवरी 1950 की ऐतिहासिक महत्ता को रेखांकित करते हुए भारत के लोकतांत्रिक सफर और संवैधानिक भविष्य की एक नई रूपरेखा प्रस्तुत की है।

संविधान: केवल कानून नहीं, एक सामूहिक चेतना

डॉ. सिन्हा ने कहा कि हमारा संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह उस राष्ट्र की सामूहिक चेतना का प्रतिबिंब है जो विविधता में अटूट विश्वास रखता है। उन्होंने जोर दिया कि भारत ने न्याय, समानता और प्रत्येक नागरिक के सम्मान का जो मार्ग चुना था, उसे बनाए रखना हर पीढ़ी की जिम्मेदारी है।

समावेशी भारत का दृष्टिकोण

संदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा समाज के अंतिम व्यक्ति और विशेष रूप से दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण पर केंद्रित रहा। डॉ. सिन्हा के अनुसार, “एक समावेशी भारत ही वास्तव में सशक्त भारत है।” उन्होंने तर्क दिया कि जब समाज के सबसे कमजोर वर्ग को सम्मान, अवसर और उद्देश्य के साथ जीने का अधिकार मिलता है, तभी गणतंत्र की नैतिक नींव मजबूत होती है।

21वीं सदी की चुनौतियां और समन्वय

आधुनिक भारत की प्रगति पर चर्चा करते हुए उन्होंने प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के सुंदर समन्वय की आवश्यकता जताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत विकास और राष्ट्रीय प्रगति के बीच संतुलन बनाने के लिए आत्मनिर्भरता, सामाजिक सद्भाव और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को हमारी कार्यशैली का आधार होना चाहिए।

कर्तव्यों के प्रति प्रतिबद्धता

अंत में, डॉ. सिन्हा ने देशवासियों से आह्वान किया कि वे न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे संवैधानिक मूल्यों के प्रति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने दैनिक व्यवहार में प्रतिबद्ध हों। उन्होंने विश्वास जताया कि हमारे विचार, कर्म और नवाचार एक स्वस्थ, समावेशी और प्रबुद्ध भारत के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।

“जय हिंद, वंदे मातरम्” के साथ समाप्त होने वाला यह संदेश न केवल गणतंत्र का उत्सव मनाने का आह्वान है, बल्कि राष्ट्र निर्माण में प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भूमिका का एक रोडमैप भी है।

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