हौसले अगर बुलंद हों तो कोई भी शारीरिक बाधा इंसान का रास्ता नहीं रोक सकती। महिला दिवस के विशेष अवसर पर करनाल से एक ऐसी ही प्रेरक कहानी सामने आई है, जो न केवल महिलाओं के लिए बल्कि समाज के हर उस व्यक्ति के लिए एक मिसाल है जो विपरीत परिस्थितियों में हार मान लेते हैं। यह कहानी है विजय लक्ष्मी की, जो आज करनाल के सरकारी कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं और न केवल शिक्षा के क्षेत्र में बल्कि खेलों की दुनिया में भी अपने संघर्ष और सफलता का परचम लहरा रही हैं।
विजय लक्ष्मी के संघर्ष की शुरुआत तब हुई जब वह मात्र तीन वर्ष की थीं। एक साधारण बुखार के दौरान हुई मेडिकल चूक (पोलियो वैक्सीन के साइड इफेक्ट) के कारण उनका शरीर लगभग पूरी तरह से लकवाग्रस्त हो गया। डॉक्टरों ने उन्हें 100 प्रतिशत दिव्यांग घोषित कर दिया। उस समय गांव के परिवेश में कई लोगों ने उनके माता-पिता से यहाँ तक कहा कि “लड़की को पढ़ाने की क्या जरूरत है, घर पर रहेगी तो दो वक्त की रोटी खा लेगी।” लेकिन विजय लक्ष्मी की माँ ने इन तानों को अनसुना कर दिया और अपनी बेटी के भविष्य को संवारने का दृढ़ निश्चय किया।
विजय लक्ष्मी याद करती हैं कि उनके गांव के स्कूल तक का सफर बहुत कठिन था। उनकी माँ उन्हें गोद में उठाकर स्कूल ले जाती थीं। गांव में घूंघट प्रथा होने के बावजूद, उनकी माँ अपनी बहू होने की मर्यादा और घूंघट की आड़ में अपनी बेटी को लेकर मीलों पैदल चलती थीं। पांचवीं तक की शिक्षा गांव में पूरी करने के बाद परिवार करनाल शिफ्ट हो गया, जहाँ विजय लक्ष्मी ने अपनी आगे की पढ़ाई सरकारी स्कूल और फिर कॉलेज से पूरी की। आज वह उसी समाज के लिए एक प्रेरणा हैं जो कभी उनकी क्षमता पर संदेह करता था।
प्रोफेसर बनने का सफर केवल शैक्षणिक उपलब्धियों तक ही सीमित नहीं रहा। विजय लक्ष्मी एक कुशल एयर पिस्टल शूटर भी हैं। उनके गले में सजे पदक उनकी कड़ी मेहनत की गवाही देते हैं। उन्होंने स्टेट लेवल पर ब्रोंज और नेशनल लेवल पर भी ब्रोंज मेडल हासिल किया है। इसके अलावा कई ओपन प्रतियोगिताओं में उन्होंने गोल्ड मेडल जीते हैं। दिलचस्प बात यह है कि वह अपनी दिनचर्या में पढ़ाई और खेल के बीच संतुलन बनाए रखती हैं। वह बताती हैं कि अपनी आंतरिक संतुष्टि के लिए उन्होंने शूटिंग को चुना और आज वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने की तैयारी कर रही हैं।
विजय लक्ष्मी की स्वावलंबन की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। पिछले सात वर्षों से वह अपनी मॉडिफाइड गाड़ी खुद ड्राइव करके कॉलेज जाती हैं। वह बताती हैं कि जब उन्होंने गाड़ी सीखी, तब भी कई ड्राइविंग स्कूलों ने उन्हें सिखाने से मना कर दिया था, लेकिन उनके परिवार और भाई के सहयोग से उन्होंने यह कौशल भी हासिल कर लिया। कॉलेज पहुँचने पर छात्र और स्टाफ उन्हें व्हीलचेयर पर बैठने में सहयोग करते हैं, जिसे वह अपनी टीम का हिस्सा मानती हैं।
महिला दिवस पर संदेश देते हुए विजय लक्ष्मी कहती हैं कि हर महिला को अपनी “इनर पावर” यानी आंतरिक शक्ति को पहचानना चाहिए। वह मानती हैं कि परिस्थितियां कभी एक जैसी नहीं होतीं, लेकिन उनसे लड़ना आना चाहिए। वह माता-पिता से भी अपील करती हैं कि बेटे और बेटी में भेदभाव न करें और बच्चों के हुनर को पहचानकर उन्हें पूरा सहयोग दें। उनकी कहानी यह साबित करती है कि अगर माँ का साथ और खुद का आत्मविश्वास हो, तो बुलंदियां कदम चूमती हैं। विजय लक्ष्मी आज हजारों युवाओं का भविष्य संवार रही हैं और यह संदेश दे रही हैं कि शारीरिक कमियां आपके सपनों के आड़े नहीं आ सकतीं।