हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के सबसे ऊंचे शिखर जाखू पर्वत पर स्थित प्राचीन जाखू मंदिर इन दिनों पर्यटकों और श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। रामायण काल से जुड़े इस मंदिर का इतिहास बेहद गौरवशाली है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान हनुमान लक्ष्मण जी के प्राण बचाने के लिए हिमालय से संजीवनी बूटी लेकर लंका जा रहे थे, तब उन्होंने जाखू पर्वत पर विश्राम किया था। कहा जाता है कि हनुमान जी की चरण पादुकाएं आज भी इस मंदिर में मौजूद हैं।
जाखू मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ स्थापित हनुमान जी की 108 फुट ऊंची विशाल प्रतिमा है। यह प्रतिमा इतनी भव्य है कि शिमला के मॉल रोड और शहर के प्रवेश द्वारों से भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। समुद्र तल से लगभग 8000 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस प्रतिमा के साथ सेल्फी लेने और दर्शन करने के लिए देश-विदेश से भारी संख्या में पर्यटक पहुँच रहे हैं। पर्यटकों का कहना है कि इंटरनेट पर इस मूर्ति को देखने के बाद यहाँ प्रत्यक्ष दर्शन करना एक अद्भुत और ऊर्जा से भर देने वाला अनुभव है।
मंदिर प्रशासन और स्थानीय सरकार ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यहाँ कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। पहले जहाँ मंदिर तक पहुँचने के लिए केवल पैदल मार्ग ही उपलब्ध था, अब श्रद्धालुओं के लिए एस्केलेटर (स्वचालित सीढ़ियां) और सड़क मार्ग की सुविधा भी प्रदान की गई है। दर्शन के लिए आए श्रद्धालुओं ने बताया कि मंदिर परिसर में साफ-सफाई और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हैं। पुलिस बल की मौजूदगी और व्यवस्थित दर्शन प्रणाली के कारण लोगों को पाठ-पूजा करने में कोई असुविधा नहीं हो रही है।
दिल्ली, हरियाणा और पंजाब सहित देश के विभिन्न हिस्सों से आए पर्यटकों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जाखू पर्वत पर पहुँचते ही एक सकारात्मक ऊर्जा का अहसास होता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए हनुमान जी के चरणों में माथा टेकते हैं। मंदिर परिसर में बंदरों की मौजूदगी भी एक विशेष आकर्षण है, जिन्हें हनुमान जी का रूप माना जाता है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, यहाँ आने वाला हर पर्यटक जाखू मंदिर के दर्शन के बिना अपनी शिमला यात्रा को अधूरा मानता है। प्रकृति की गोद में ऊंचे पर्वतों के बीच स्थित यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि शिमला के पर्यटन मानचित्र पर भी एक अमूल्य धरोहर है।