February 15, 2026
15 Feb 18

करनाल: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में करनाल के सेक्टर 7 स्थित कम्युनिटी सेंटर में एक विशाल हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक शताब्दी समारोह में गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। कार्यक्रम स्थल पर पहुँचने पर आयोजकों और स्थानीय नागरिकों ने फूलों की वर्षा कर और फूल मालाओं के साथ स्वामी जी का गर्मजोशी से स्वागत किया।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक ऐसी सोच है जो प्रत्येक नागरिक के भीतर राष्ट्र स्वाभिमान को जागृत करती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि संघ का उद्देश्य समाज से वर्ग, वर्ण और ऊंच-नीच के भेदभाव को समाप्त कर समरसता स्थापित करना है। स्वामी जी ने पंच परिवर्तन के संकल्प को दोहराते हुए जन-जन से स्वदेशी को स्वाभिमान के रूप में अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि हमारे आहार, व्यवहार, विचार और परंपराओं में स्वदेशी का सम्मान होना चाहिए।

महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर आयोजित इस सम्मेलन में स्वामी जी ने भगवान शिव के स्वरूप की चर्चा करते हुए कहा कि महादेव विष पीकर अमृत बांटने की सनातन सोच का प्रतीक हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जिस तरह राम मंदिर का निर्माण और धारा 370 का हटना जैसे संकल्प पूरे हुए हैं, उसी तरह आने वाले समय में ऋषि परंपरा और महर्षि व्यास का सम्मान संसद और विधानसभाओं तक पहुँचेगा। उन्होंने वंदे मातरम को राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक बताते हुए सरकार के नए निर्देशों का स्वागत किया।

सम्मेलन में ब्रह्माकुमारी आश्रम से शिखा दीदी ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति सत्य, प्रेम और अहिंसा की संस्कृति है। उन्होंने लोगों से जाति-पाती के बंधनों को तोड़कर एकजुट होने की अपील की ताकि एक सुंदर और दिव्य समाज का निर्माण हो सके।

आरएसएस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित इस हिंदू सम्मेलन में हजारों की संख्या में समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने हिस्सा लिया। पूरे कार्यक्रम के दौरान वातावरण राष्ट्रभक्ति और भक्ति के रंग में डूबा रहा। आयोजकों ने बताया कि शताब्दी वर्ष के दौरान बस्तियों और मोहल्लों के स्तर पर ऐसे सम्मेलनों का आयोजन जारी रहेगा ताकि हिंदू समाज के भीतर सनातन गौरव और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों की भावना को और अधिक सुदृढ़ किया जा सके।

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