शिमला / हिमाचल प्रदेश : इन दिनों ‘विंटर कार्निवल 2025’ के उल्लास में डूबी हुई है। नगर निगम शिमला और भाषा एवं संस्कृति विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस भव्य उत्सव ने पहाड़ों की रानी को एक जीवंत सांस्कृतिक रंगमंच में बदल दिया है। नए साल के स्वागत की तैयारियों के बीच आयोजित इस कार्निवल की सबसे बड़ी विशेषता ऐतिहासिक माल रोड पर निकाली गई सांस्कृतिक परेड रही, जिसमें हिमाचल प्रदेश के सभी 12 जिलों की विविध संस्कृतियों का अनूठा संगम देखने को मिला।
सांस्कृतिक परेड के दौरान कुल्लू, किन्नौर, लाहौल-स्पीति, हमीरपुर, मंडी, कांगड़ा और चंबा जैसे जिलों के सांस्कृतिक दलों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा और आभूषणों में सज्ज होकर अपनी समृद्ध विरासत का प्रदर्शन किया। कुल्लू के दल ने जहाँ अपने प्रसिद्ध ‘पट्टू’ और चांदी के पारंपरिक आभूषणों ‘चंद्रसेन’ के साथ पहाड़ी नाटी की प्रस्तुति दी, वहीं किन्नौर के कलाकारों ने अपने हाथ से बुने ऊनी वस्त्रों और विशिष्ट संगीत वाद्ययंत्रों के साथ दर्शकों का मन मोह लिया।
चंबा से आए कलाकारों ने भगवान शिव के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हुए ऊन से बने विशेष ‘चोला’ और ‘पटका’ पहनकर परेड में हिस्सा लिया। चंबा की टोपी, जिसे कैलाश पर्वत और मणिमहेश के शिव स्वरूप का प्रतीक माना जाता है, पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र रही। इसी प्रकार, लाहौल-स्पीति की झांकी ने अपनी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच पनपी मजबूत और रंगीन संस्कृति की झलक पेश की।
इस कार्निवल का आनंद लेने के लिए देश के कोने-कोने से पर्यटक शिमला पहुँच रहे हैं। पर्यटकों के लिए यह एक दुर्लभ अवसर है जहाँ वे एक ही स्थान पर पूरे हिमाचल प्रदेश के खान-पान, जैसे कुल्लू का प्रसिद्ध ‘सिद्धू’, पारंपरिक औजारों और लोक संगीत का अनुभव कर पा रहे हैं। स्थानीय कलाकारों ने पारंपरिक गीतों और ढोल-नगाड़ों की थाप पर नृत्य कर पूरे वातावरण को उत्सवमयी बना दिया।
विंटर कार्निवल न केवल पर्यटन को बढ़ावा देने का एक सशक्त माध्यम बन रहा है, बल्कि यह युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का भी एक सार्थक प्रयास है। प्रशासन द्वारा की गई पुख्ता व्यवस्थाओं के बीच पर्यटक और स्थानीय निवासी इस सांस्कृतिक महाकुंभ का भरपूर लुत्फ उठा रहे हैं। शिमला की सर्द वादियों में संगीत, नृत्य और रंगों का यह खेल नए साल के आगमन तक निरंतर जारी रहेगा।