हरियाणा के करनाल जिले के बीजना गांव में एक ऐसा अनूठा और भावुक कर देने वाला विवाह समारोह देखने को मिला, जिसने न केवल ग्रामीणों का दिल जीत लिया, बल्कि आधुनिक समाज और युवा पीढ़ी के लिए वैवाहिक स्थिरता की एक नई मिसाल पेश की है। यहाँ 85 वर्षीय ओम प्रकाश और उनकी 80 वर्षीय पत्नी सुनहरी देवी ने अपनी शादी की 66वीं वर्षगांठ को एक वास्तविक विवाह उत्सव की तरह मनाया। इस बुजुर्ग दंपति के बच्चों और पोते-पोतियों ने मिलकर इस दिन को इतना यादगार बना दिया कि पूरे क्षेत्र में इसकी चर्चा हो रही है।
इस विशेष उत्सव की सबसे भावुक करने वाली बात यह थी कि दुल्हन बनी सुनहरी देवी ने वही गुलाबी रंग का दुपट्टा ओढ़ा था, जिसे उन्होंने 66 साल पहले अपनी शादी के दिन पहना था। हालांकि वक्त के साथ बहुत कुछ बदल गया, लेकिन उस दुपट्टे की चमक और इस जोड़े के बीच का प्रेम आज भी वैसा ही नजर आया। दूल्हा बने ओम प्रकाश जी भी पूरी तरह से विवाह के रंग में रंगे दिखे। कार्यक्रम में बकायदा जयमाला हुई, एक-दूसरे को अंगूठियां पहनाई गईं और ढोल-नगाड़ों की थाप पर पूरा परिवार और गांव झूम उठा।
ओम प्रकाश जी ने मजाकिया लहजे में अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि 1960 में जब उनकी शादी हुई थी, तब उन्होंने शुरू में मना कर दिया था, लेकिन परिवार के दबाव में यह रिश्ता तय हुआ। हालांकि, पिछले छह दशकों का सफर उनके लिए बेहद खुशगवार रहा है। वहीं, सुनहरी देवी ने बताया कि उस समय उनकी उम्र बहुत कम थी और उन्हें शादी का ज्यादा पता भी नहीं था, लेकिन आज अपने बच्चों द्वारा दोबारा अपनी शादी होते देखना उन्हें असीम खुशी दे रहा है। उन्होंने युवा लड़कियों को संदेश देते हुए कहा कि रिश्तों में थोड़ा-बहुत मनमुटाव होना स्वाभाविक है, लेकिन मिल-जुलकर रहने में ही जीवन का असली सुख है।
इस बुजुर्ग दंपति के सात बच्चे हैं (चार बेटियां और तीन बेटे), जो सभी अब अपने-अपने परिवारों के साथ सुखी जीवन जी रहे हैं। उनके बेटे सत्यवान ने बताया कि आज के दौर में जहां छोटे-छोटे विवादों के कारण रिश्ते टूट रहे हैं और बुजुर्गों को अकेलेपन का सामना करना पड़ता है, वहां उनके परिवार ने एक नई मुहिम शुरू करने का सोचा। उन्होंने समाज को यह संदेश देने का प्रयास किया कि अपने माता-पिता के प्रति सम्मान और प्रेम प्रकट करने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता। उन्होंने बताया कि यह उनका काफी पुराना अरमान था कि वे अपने माता-पिता की शादी की सालगिरह को एक ऐतिहासिक जश्न के रूप में मनाएं।
उत्सव के दौरान पूरे गांव को आमंत्रित किया गया था। जयमाला के बाद बुजुर्ग दंपति को एक फूलों से सजी बग्गी पर बैठाया गया और पूरे गांव में उनकी शोभायात्रा निकाली गई। इस दौरान डीजे पर बजते गानों और नाचते गाते परिजनों ने इस पल को यादगार बना दिया। गांव की बहुओं और बेटियों ने बताया कि वे इस अनूठे आयोजन को लेकर पिछले कई दिनों से उत्साहित थीं। आसपास के गांवों से भी लोग इस अनोखी शादी को देखने के लिए पहुंचे थे। यह समारोह केवल एक उत्सव नहीं था, बल्कि भारतीय पारिवारिक मूल्यों और एक-दूसरे के प्रति समर्पण का जीता-जागता प्रमाण था, जो यह सिखाता है कि प्रेम की कोई उम्र नहीं होती और सच्चे रिश्तों की नींव विश्वास और त्याग पर टिकी होती है।