करनाल का सरकारी अस्पताल (कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज/सिविल अस्पताल), जिसे करोड़ों रुपये खर्च करके रेनोवेट किया गया था, आज बदहाली की एक जिंदा मिसाल बन गया है। सरकार द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के बड़े-बड़े दावे यहां की जमीनी हकीकत के सामने दम तोड़ते नजर आ रहे हैं। अस्पताल के वार्डों, विशेषकर बच्चों के वार्ड में गंदगी, बदबू और अव्यवस्था का ऐसा आलम है कि यहां इलाज कराने आए मरीज और उनके परिजन और अधिक बीमार होने को मजबूर हैं।
अस्पताल के अंदर कदम रखते ही गंदगी और तेज दुर्गंध का सामना करना पड़ता है। पानी निकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण बारिश का पानी जमा है, जिससे संक्रमण का खतरा बना हुआ है। लेकिन सबसे भयावह स्थिति वार्डों के अंदर की है। मरीजों के बेड के नीचे और आसपास चूहों की गंदगी (वेस्टेज) के ढेर लगे हुए हैं, जो महीनों से साफ नहीं किए गए हैं। परिजनों का कहना है कि यहां सांस लेना भी दूभर हो गया है, लेकिन मजबूरी में उन्हें अपने बीमार बच्चों के साथ यहां रुकना पड़ रहा है।
मरीजों के परिजनों ने बताया कि अस्पताल में चूहों का आतंक इतना ज्यादा है कि वे रात भर सो नहीं पाते। एक महिला ने बताया, “रात को 2 बजे मेरे बच्चे के ऊपर चूहा चढ़ गया, जिससे वह डर गया। यहां बैठना मुश्किल है, लेकिन गरीबी के कारण हम कहां जाएं?” उन्होंने आरोप लगाया कि वीआईपी कमरों और डॉक्टरों के केबिन में तो साफ-सफाई रहती है, लेकिन गरीबों के वार्ड की सुध लेने वाला कोई नहीं है। यदि ऐसी ही गंदगी किसी अधिकारी के कमरे में हो, तो वे वहां एक मिनट भी न रुकें।
सफाई व्यवस्था की पोल खोलते हुए एक परिजन ने बताया कि सफाई कर्मचारियों को पिछले छह महीनों से वेतन नहीं मिला है, जिसके कारण वे काम करने में आनाकानी करते हैं। वार्ड में दिन में बमुश्किल एक या दो बार ही पोछा लगता है, और कई बार तो 24-48 घंटे तक सफाई नहीं होती। डस्टबिन भी समय पर खाली नहीं किए जाते। यहां तक कि मरीजों को दी जाने वाली बेडशीट भी गंदी और मैली होती हैं। जब एक महिला ने साफ चादर की मांग की, तो उसे यह कहकर मना कर दिया गया कि “यहां ऐसा ही मिलता है,” जिसके बाद वह घर से अपनी चादर लाने को मजबूर हुई।
वार्ड में सुरक्षा मानकों की भी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। मरीजों के बेड के बिल्कुल पास बिजली के खुले बोर्ड और नंगी तारें लटक रही हैं। छोटे बच्चे खेल-खेल में इन तारों को छू सकते हैं, जिससे कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। जब परिजनों ने इस बारे में स्टाफ से शिकायत की, तो उन्हें ही बच्चों का ध्यान रखने की नसीहत देकर चुप करा दिया गया। एक महिला ने कहा, “अगर करंट लगने से कोई हादसा हो जाता है, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा?”
अस्पताल प्रशासन और सरकार की अनदेखी से नाराज परिजनों ने मुख्यमंत्री और स्थानीय विधायक से हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर भारी बजट आवंटित करती है, लेकिन वह पैसा कहां जाता है, यह एक बड़ा सवाल है। गरीब आदमी उम्मीद लेकर सरकारी अस्पताल आता है, लेकिन यहां की गंदगी और अव्यवस्था उसे और निराश कर देती है। मरीजों का कहना है कि कम से कम बच्चों के वार्ड में तो सफाई और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए ताकि संक्रमण और न फैले।