- अयोध्या में श्री राम मंदिर के शिखर पर धर्म ध्वजा फहराई गई, PM मोदी भावुक हुए, सपने से साकार हुए राम मंदिर की बात कही।
- CM योगी ने ध्वज को आस्था और गर्व का प्रतीक बताया, इसे केवल निशान नहीं बल्कि विश्वास की जीत करार दिया।
- करनाल के श्री करणेश्वर महादेव मंदिर के आचार्य षष्टि वल्लभ पटेल ने दिन को हर सनातनी के लिए गर्व और प्रसन्नता का ऐतिहासिक पल बताया।
- पंडित जी ने बताया कि राम मंदिर बिना लोहे की कीलों के, ग्रेनाइट व बलुआ पत्थर से बना है और भूकंप व मौसम के प्रभाव से सुरक्षित डिज़ाइन किया गया है।
- राम लल्ला की कृष्ण शीला मूर्ति पर पहली सूर्य किरण मस्तक पर पड़ने की व्यवस्था को आस्था और विज्ञान के अनोखे संगम का उदाहरण बताया गया।
अयोध्या में श्री राम मंदिर के शिखर पर आज धर्म ध्वजा फहराई गई, जिसे ऐतिहासिक क्षण बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भावुक हो उठे। ध्वजारोहण के बाद उन्होंने कहा कि कभी राम मंदिर को लोग सिर्फ एक “सपना” मानते थे, लेकिन आज वह भ्रम पूरी तरह टूट चुका है। उनकी भावुकता और क्षणिक चुप्पी ने शब्दों से अधिक गहरी बात कह दी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कहा कि यह ध्वज केवल एक निशान नहीं, बल्कि आस्था और राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक है।
इसी प्रसंग पर करनाल के प्राचीन श्री करणेश्वर महादेव मंदिर में भी विशेष उत्साह और श्रद्धा का माहौल देखा गया। यहां के आचार्य षष्टि वल्लभ पटेल ने कहा कि यह दिन प्रत्येक हिंदू और सनातन धर्म को मानने वाले हर व्यक्ति के लिए अत्यंत गर्व का विषय है। उन्होंने कहा कि यह क्षण इतिहास के स्वर्णिम पन्ने की तरह दर्ज होगा, क्योंकि जिस राम मंदिर को कभी केवल कल्पना समझा जाता था, उसका निर्माण और शिखर पर धर्म ध्वजा फहराना अब साकार हो चुका है।
पंडित षष्टि वल्लभ पटेल ने बताया कि आज का दिवस “विवाह पंचमी” भी है, जिस दिन भगवान राम का विवाह माना जाता है, ऐसे शुभ दिन पर धर्म ध्वजा फहराया जाना अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। उनके अनुसार, यह दिन लोगों की आस्था और विश्वास की जीत का प्रतीक है और आमजन के लिए संदेश है कि राम जी के जन्मस्थान पर बने इस भव्य मंदिर को केवल ईंट–पत्थर नहीं, बल्कि विश्वास और मर्यादा की नींव पर खड़ा किया गया है।
राम मंदिर के स्थापत्य और निर्माण शैली पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि पूरे मंदिर के निर्माण में लोहे की कोई भी कील प्रयोग नहीं की गई, बल्कि ग्रेनाइट, बलुआ पत्थर और अन्य शिलाओं का उपयोग कर ऐसा ढांचा तैयार किया गया है जिस पर भूकंप जैसे झटकों का भी असर न के बराबर होगा। उनका कहना था कि भारत की प्राचीन स्थापत्य कला की परंपरा पहले से ही अद्वितीय रही है, देश के अनेक प्राचीन मंदिर आज भी वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बने हुए हैं कि बिना आधुनिक तकनीक के खंभे और संरचनाएं कैसे सैकड़ों–हजारों वर्ष से टिके हुए हैं।
उन्होंने कहा कि विश्व की सबसे पुरानी और समृद्ध स्थापत्य परंपरा भारत में है और आज का राम मंदिर उसी परंपरा की आधुनिक झलक है। बड़े–बड़े इंजीनियर और शिल्पकारों ने मिलकर जो डिजाइन तैयार की है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अध्ययन और दर्शन योग्य रहेगी। यह दिन उन सभी के लिए भी ऐतिहासिक है जिन्होंने इस मंदिर के निर्माण में अपना योगदान दिया है और उन भावी पीढ़ियों के लिए भी, जो इस कला को देख–समझकर गर्व महसूस करेंगी।
कृष्ण शीला से निर्मित राम लल्ला की मूर्ति पर बात करते हुए पंडित जी ने कहा कि भगवान के हर विग्रह में एक अलग ही दिव्यता और सौंदर्य होता है, लेकिन जिस शिल्पकार को ऐसी प्रतिमा गढ़ने का अवसर मिलता है, वह स्वयं भगवान की विशेष कृपा का पात्र बन जाता है। उन्होंने बताया कि मूर्ति इस तरह से स्थापित की गई है कि सूर्य की पहली किरण सीधे भगवान के मस्तक पर पड़ती है, जो आस्था और विज्ञान के सुंदर मेल का उदाहरण है।
उन्होंने यह भी कहा कि मूर्ति और मंदिर की शिलाओं को इस प्रकार तैयार किया गया है कि मौसम, समय और सामान्य केमिकल प्रभावों से भी लंबे समय तक कोई क्षति न हो। यह निर्माण न केवल आध्यात्मिक रूप से, बल्कि तकनीकी दृष्टि से भी अद्वितीय है। पंडित जी ने कहा कि आज का दिन सभी के लिए प्रेरणा का दिन है, जिसमें भक्त भगवान श्री राम और भगवान कृष्ण दोनों के प्रति अपनी श्रद्धा और कृतज्ञता को और सशक्त कर सकते हैं।
अंत में उन्होंने करनाल और आस-पास के लोगों को संदेश देते हुए कहा कि इस ऐतिहासिक दिन पर सभी को चाहिए कि वे भगवान श्री राम के चरित्र, उनकी मर्यादाओं और जीवन मूल्यों को याद करें और रामायण में वर्णित मर्यादा पुरुषोत्तम की जीवनशैली को अपने आचरण में उतारने की कोशिश करें। उन्होंने कहा कि धर्म, आस्था, भावनाएं और जीवन में अनुशासन – इन सबका संतुलित संगम ही इस दिन का वास्तविक संदेश है।