देश की सीमाओं की रक्षा में अपने जीवन के महत्वपूर्ण 39 साल समर्पित करने के बाद, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जांबाज जवान पालीराम चौधरी जब अपने पैतृक निवास लौटे, तो पूरा इलाका उनके स्वागत में उमड़ पड़ा। हरियाणा के करनाल जिले के निसिंग कस्बे में उनके आगमन पर जो उत्साह और गर्व का माहौल दिखा, उसने यह साबित कर दिया कि समाज में सैनिकों के प्रति सम्मान की भावना आज भी सर्वोपरि है। करीब चार दशकों तक कठिन परिस्थितियों में देश की रक्षा करने वाले इस योद्धा का स्वागत किसी उत्सव से कम नहीं था।
पालीराम चौधरी की घर वापसी के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में न केवल उनके परिवार के सदस्य, बल्कि दूर-दराज के गांवों से आए लोग और पूर्व सैनिक भी शामिल हुए। जैसे ही वह निसिंग के बस स्टैंड पर पहुंचे, गगनभेदी नारों—”वंदे मातरम” और “इंकलाब जिंदाबाद”—से पूरा आसमान गूंज उठा। ग्रामीणों ने उन्हें फूलों की मालाओं से लाद दिया और उनके सम्मान में एक भव्य रोड शो निकाला गया। खुले वाहन में सवार होकर जब वह अपने गांव की ओर बढ़े, तो रास्ते भर लोगों ने उन पर फूलों की वर्षा की और उन्हें अपना स्नेह व सम्मान दिया।
इस सेवानिवृत्ति समारोह की सबसे भावुक कड़ी उनके परिवार का मिलन रही। उनके बेटे समीर और अन्य परिजन, जो लंबे समय से ऑस्ट्रेलिया में रह रहे हैं, इस विशेष दिन का साक्षी बनने के लिए सात समंदर पार से भारत पहुंचे। परिजनों का कहना था कि यह उनके लिए अत्यंत गर्व का क्षण है कि उनके पिता 40 साल की बेदाग सेवा के बाद सकुशल घर लौटे हैं। उन्होंने बताया कि पिता की अनुपस्थिति में परिवार ने कई चुनौतियों का सामना किया, लेकिन उनके देश प्रेम और कर्तव्य परायणता ने हमेशा उन्हें प्रेरित किया।
अपनी सेवा के दौरान के अनुभवों को साझा करते हुए पालीराम चौधरी ने बताया कि उन्होंने कारगिल युद्ध और ऑपरेशन सिंदूर जैसे कई महत्वपूर्ण अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि बीएसएफ “डिफेंस की पहली पंक्ति” होती है और सीमा पर ड्यूटी करना किसी चुनौती से कम नहीं होता। उन्होंने उन दिनों को याद किया जब पाकिस्तान की ओर से घुसपैठ की कोशिशें और भड़काऊ गतिविधियां चरम पर थीं, लेकिन भारतीय जवानों ने अपनी बहादुरी से हर नापाक कोशिश को नाकाम कर दिया। उन्होंने यह भी साझा किया कि तकनीक के इस युग में उन्होंने ड्रोन से लेकर पैदल गश्त तक, हर माध्यम से सीमाओं की चौकसी की है।
आज के युवाओं, जो अक्सर सेना की नौकरी से पीछे हटते हैं, उन्हें संदेश देते हुए चौधरी ने कहा कि फौज केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि देश के प्रति एक जुनून और आत्म-सम्मान का विषय है। उन्होंने कहा कि पैसा सब कुछ नहीं होता, जो सम्मान और गौरव एक सैनिक की वर्दी में मिलता है, वह दुनिया की किसी अन्य नौकरी में संभव नहीं है। उन्होंने युवाओं से अपने शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने और देश सेवा के लिए आगे आने का आह्वान किया।
गांव पहुंचने पर अन्य पूर्व सैनिकों ने उन्हें सलामी दी और गले मिलकर उनका अभिनंदन किया। सम्मान की इस कड़ी में उन्हें नोटों के हार भी पहनाए गए, जो ग्रामीण अंचलों में अत्यधिक सम्मान का प्रतीक माना जाता है। पूरे गांव में जश्न का माहौल रहा और लोगों ने आतिशबाजी कर अपनी खुशी का इजहार किया। पालीराम चौधरी ने भावुक होते हुए कहा कि उन्होंने अपनी ट्रेनिंग के दौरान जो शपथ ली थी, उसे पूरी निष्ठा के साथ निभाया है और आज वह एक संतुष्ट सैनिक के रूप में अपने घर वापस आए हैं। यह आयोजन न केवल एक व्यक्ति की सेवानिवृत्ति का प्रतीक था, बल्कि देश के प्रति अटूट निष्ठा और बलिदान को सलाम करने का एक जरिया भी बना।