चंडीगढ़ के मध्य में स्थित सेक्टर-34 का हीलिंग हॉस्पिटल आज अपनी अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीक और मानवीय दृष्टिकोण के कारण देश-दुनिया में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। पिछले 10 वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहा यह सुपर स्पेशलिटी अस्पताल घुटने की सर्जरी के क्षेत्र में एक नई क्रांति लेकर आया है। यहाँ विशेष रूप से ‘रोबोलेंस एफटी 3D नी रिसरफेसिंग’ (Robolens FT 3D Knee Resurfacing) तकनीक का उपयोग किया जा रहा है, जो पारंपरिक नी-रिप्लेसमेंट सर्जरी से काफी अलग और अधिक प्रभावी है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें मरीज का पूरा घुटना बदलने की आवश्यकता नहीं होती। सीनियर सर्जन डॉक्टर निशांत सेठिया के अनुसार, यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर आधारित एक प्रक्रिया है जिसमें स्वस्थ हड्डी को सुरक्षित रखा जाता है और केवल उसी हिस्से को निकाला जाता है जो घिस चुका या खराब हो चुका है। सर्जरी से पहले मरीज का हिप से एंकल तक का 3D सीटी स्कैन किया जाता है, जिसके आधार पर कंप्यूटर पर एक वर्चुअल सर्जरी की योजना बनाई जाती है। इससे सर्जन को पहले ही पता होता है कि किस आकार की कैप लगानी है और कितनी हड्डी निकालनी है, जिससे मानवीय चूक की गुंजाइश शून्य हो जाती है।
पारंपरिक सर्जरी के मुकाबले रोबोलेंस तकनीक के कई फायदे हैं। इसमें ब्लड लॉस (रक्त की कमी) न्यूनतम होती है और जांघ की हड्डी में ड्रिल करने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे भविष्य में होने वाले दर्द और आईसीयू में रुकने का जोखिम खत्म हो जाता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हीलिंग हॉस्पिटल में इस तकनीक से सर्जरी करवाने वाले मरीज ऑपरेशन के मात्र 3 से 4 घंटे बाद ही अपने पैरों पर चलना शुरू कर देते हैं। अधिकांश मरीज दो से तीन हफ्तों में अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट आते हैं और एक महीने के भीतर दौड़ना भी शुरू कर सकते हैं।
अस्पताल की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ पिछले 5 वर्षों में 8,000 से अधिक सफल सर्जरीज की जा चुकी हैं। यहाँ केवल पंजाब या हरियाणा ही नहीं, बल्कि पैन इंडिया (दिल्ली, बिहार, दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल) और विदेशों जैसे कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से भी मरीज खिंचे चले आ रहे हैं। अस्पताल के काउंसलर्स का कहना है कि विदेशों में उन्नत सुविधाएं होने के बावजूद, मरीज भारत और विशेषकर हीलिंग हॉस्पिटल इसलिए आते हैं क्योंकि यहाँ उन्हें अत्याधुनिक तकनीक के साथ-साथ एक पारिवारिक और अपनापन भरा माहौल मिलता है।
अस्पताल में भर्ती मरीजों ने भी अपने सुखद अनुभव साझा किए। बिहार से आई एक महिला मरीज ने बताया कि उनकी सर्जरी को मात्र 24 घंटे हुए हैं और वे बिना किसी सहारे के चलने-फिरने में समर्थ हैं। दिल्ली और उत्तराखंड से आए मरीजों ने भी डॉक्टर निशांत सेठिया और अस्पताल के स्टाफ की सराहना करते हुए कहा कि यहाँ का ‘होमली एनवायरनमेंट’ (घरेलू माहौल) डर को खत्म कर देता है। अस्पताल प्रबंधन का मानना है कि हर घुटने के दर्द का इलाज सर्जरी नहीं है; वे पहले प्रिवेंटिव मेजर और दवाइयों से ठीक करने की कोशिश करते हैं और सर्जरी को अंतिम विकल्प के रूप में ही चुनते हैं।
100 बेड वाले इस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में सुरक्षा और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। ओटी (ऑपरेशन थिएटर) में हेपा फिल्टर और आधुनिक संक्रमण-रोधी प्रणालियां लगी हुई हैं। अस्पताल प्रशासन का संदेश स्पष्ट है कि घुटने की सर्जरी से डरने की जरूरत नहीं है। अत्याधुनिक तकनीक और विशेषज्ञों की देखरेख में अब यह प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षित और सटीक हो चुकी है, जिससे मरीज को अपनी खोई हुई गतिशीलता और चलने-फिरने की आजादी वापस मिल जाती है।