हरियाणा के करनाल में विकास कार्यों की योजना और क्रियान्वयन को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। होटल ज्वेल से आईटीआई चौक की ओर जाने वाले मार्ग पर करोड़ों रुपए की लागत से प्रस्तावित साइकिल ट्रैक को लेकर जो कार्यवाही शुरू की गई थी, वह अब प्रशासनिक असमंजस और योजना की अस्पष्टता का उदाहरण बनती दिखाई दे रही है।
इस मार्ग पर पहले से लगी हुई टाइलों को उखाड़ दिया गया था। स्थानीय स्तर पर यह जानकारी सामने आई थी कि यहां साइकिल ट्रैक विकसित किया जाना है। इसी आधार पर सड़क किनारे लगी टाइलों को हटाकर निर्माण की प्रक्रिया आरंभ की गई। लेकिन कुछ ही समय बाद यह काम रुक गया और महीनों तक उखाड़ी गई टाइलें उसी स्थिति में पड़ी रहीं।
अब हालात यह हैं कि जिन टाइलों को हटाया गया था, उन्हें दोबारा से उसी स्थान पर बिछाया जा रहा है। ठेकेदार के कर्मचारी मौके पर काम कर रहे हैं और रेत-सीमेंट डालकर पुरानी टाइलों को फिर से लगाया जा रहा है। इससे स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठ रहा है कि यदि साइकिल ट्रैक बनना ही नहीं था, तो पहले टाइलें क्यों हटाई गईं?
एनओसी और स्वीकृति पर सवाल
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा में है कि संबंधित परियोजना को लेकर सभी आवश्यक स्वीकृतियां स्पष्ट रूप से प्राप्त नहीं थीं। बातचीत में सामने आया कि संभवतः एनओसी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी। यदि यह तथ्य सही है, तो बिना पूर्ण प्रशासनिक अनुमति के कार्य शुरू करना गंभीर लापरवाही मानी जाएगी।
जानकारी यह भी सामने आई कि इस योजना को लेकर जनप्रतिनिधियों को पूरी तरह अवगत नहीं कराया गया था। यदि विकास कार्यों में जनप्रतिनिधियों की भागीदारी या सहमति नहीं ली जाती, तो इससे पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
क्या वास्तव में थी साइकिल ट्रैक की जरूरत?
यह मार्ग ऐसा क्षेत्र है जहां बीच में बिजली के खंभे स्थित हैं और सामान्य दिनों में सड़क किनारे वाहन पार्किंग भी होती है। ऐसे में करोड़ों रुपए खर्च कर साइकिल ट्रैक बनाने की व्यवहारिकता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
शहर में पहले से मौजूद अन्य साइकिल ट्रैक का उपयोग कितना हो रहा है, यह भी चर्चा का विषय है। यदि पहले से निर्मित ट्रैक पर्याप्त रूप से उपयोग में नहीं हैं, तो नए ट्रैक की आवश्यकता पर गंभीर अध्ययन होना चाहिए था।
विकास कार्यों का उद्देश्य केवल निर्माण करना नहीं, बल्कि उपयोगिता सुनिश्चित करना भी होता है। यदि योजना ज़मीन पर व्यवहारिक न हो, तो वह संसाधनों की बर्बादी बन जाती है।
महीनों तक रुका रहा काम
टाइलें उखाड़ने के बाद लंबे समय तक कार्य बंद पड़ा रहा। इससे स्थानीय व्यापारियों और राहगीरों को असुविधा का सामना करना पड़ा। अधूरी सड़क और बिखरी टाइलों के कारण मार्ग की स्थिति प्रभावित रही।
जब इस विषय को मीडिया में प्रमुखता से उठाया गया, तब जाकर काम रोका गया। अब स्थिति यह है कि साइकिल ट्रैक निर्माण की योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है और पुरानी व्यवस्था को बहाल किया जा रहा है।
जनता के पैसे पर सवाल
सबसे बड़ा मुद्दा वित्तीय जिम्मेदारी का है। टाइलें उखाड़ना, फिर महीनों तक काम रोकना और अब दोबारा टाइलें लगाना—यह पूरा क्रम सार्वजनिक धन के उपयोग पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
यदि करोड़ों की परियोजना का आरंभ बिना ठोस योजना, स्वीकृति और तकनीकी मूल्यांकन के किया गया था, तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। विकास कार्य आवश्यक हैं, लेकिन सुनियोजित तरीके से।
प्रशासन से अपील
स्थानीय लोगों और सामाजिक वर्गों की ओर से प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से अपील की जा रही है कि भविष्य में विकास योजनाओं को पूरी योजना और समन्वय के साथ लागू किया जाए।
सार्वजनिक परियोजनाओं में पारदर्शिता, तकनीकी अध्ययन, ट्रैफिक प्रबंधन का आकलन और स्थानीय जरूरतों का विश्लेषण अनिवार्य होना चाहिए। पहले निर्माण और फिर निरस्तीकरण जैसी स्थिति से न केवल धन की बर्बादी होती है, बल्कि प्रशासनिक विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।
करनाल में साइकिल ट्रैक को लेकर सामने आया यह मामला यह संकेत देता है कि विकास के नाम पर की जाने वाली पहल में स्पष्टता और जवाबदेही अत्यंत आवश्यक है। जनता का पैसा जनता की सुविधा के लिए है, न कि प्रयोगात्मक योजनाओं के लिए।
अब देखना यह होगा कि संबंधित विभाग इस पूरे प्रकरण पर क्या स्पष्टीकरण देता है और भविष्य में ऐसी स्थिति की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।