- प्रशिक्षुओं को सॉल्ट तक का भी नहीं होता पता
करनाल: ब्रेकिग न्यूज : जिले के सरकारी अस्पतालों व स्वास्थ्य केंद्रों पर पिछले तीन सालों से मरीजों को दवाएं देने के लिए फार्मासिस्ट की कमी है। इससे मरीजों को भी दवा लेने का खतरा बना रहता है। जिले में 61 प्रतिशत यानि 75 में से 46 पद फार्मासिस्ट के खाली हैं। केवल 29 फार्मासिस्ट ही पद पर तैनात हैं। हालत ये हैं कि जिला नागरिक अस्पताल में 2, नीलोखेड़ी अस्पताल में 7 व असंध के अस्पताल में 6 पद फार्मासिस्ट के खाली पड़े हुए हैं।
अस्पताल से लेकर स्वास्थ्य केंद्रों पर अपने स्तर पर स्टाफ नर्स, प्रशिक्षु या अन्य अप्रशिक्षित स्टाफ से दवा वितरित कर रहे हैं। इन्हें न तो दवा के सॉल्ट के बारे में पता और न ही विकल्प दवा की कोई जानकारी है। ऐसे में मरीजों को दवा के बारे में कौन समझाएगा। फार्मासिस्ट की अनुपस्थिति में मरीजों को दवाएं तो दी जा रही हैं। लेकिन किसी मरीज को गलत दवा दिए जाने पर उसकी जिम्मेदारी कोई नहीं लेगा।
फार्मासिस्ट के ये होते हैं नियम
फार्मेसी अधिनियम 1948 के अनुसार एक पंजीकृत फार्मासिस्ट के अलावा कोई भी व्यक्ति किसी मेडिकल प्रैक्टिशनर के नुस्खे पर किसी भी दवा को मिश्रित, तैयार, मिश्रण या वितरित नहीं कर सकता। फार्मासिस्टों की कमी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के विभिन्न पहलुओं जैसे वितरण, भंडारण, खरीद, टीके की कोल्ड चेन बनाए रखने और अन्य कार्यों को भी प्रभावित करती है।
24 स्वास्थ्य केंद्र बिना फार्मासिस्ट के चल रहे
जिले में सीएचसी व पीएचसी के 24 स्वास्थ्य केंद्र बिना फार्मासिस्ट के चल रहे हैं। जहां एक भी फार्मासिस्ट तैनात नहीं है। इनमें पीएचसी खुखनी, ब्याना, कुटेल, बरसत, चौरा, गुढा, बड़ौता, जुडंला, गुल्लरपुर, गगसीना, सालवन, मुनक, गगसीना, पधाना, रंबा, पोपड़ा, उपलाना, काछवा, सग्गा, सीएचसी निसिंग, तरावड़ी, सांभली, निगदू स्कूल हेल्थ क्लीनिक करनाल शामिल है, जहां एक भी फार्मासिस्ट पद पर तैनात नहीं है।
ये होती है जिम्मेदारी फार्मासिस्ट
अस्पताल में आने वाले मरीज को बताना होता है कि कैसे और कब दवाएं लेनी चाहिए। लिखित में इंस्ट्रक्शन प्रदान करना। इसके साथ ही दवाओं के कारण होने वाले साइड इफेक्ट बताना या चर्चा करना शामिल है।