करनाल स्थित प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र, कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज एवं सरकारी अस्पताल में मरीजों को दी जाने वाली बुनियादी सुविधाओं की पोल खुल गई है। करोड़ों रुपये की लागत से बनी इस आलीशान इमारत के भीतर व्यवस्थाएं इस कदर चरमरा गई हैं कि मरीजों को मामूली व्हीलचेयर और स्ट्रेचर के लिए भी घंटों संघर्ष करना पड़ रहा है। अस्पताल परिसर में बदहाली का आलम यह है कि जो व्हीलचेयर उपलब्ध हैं, वे भी टूटी-फूटी अवस्था में हैं और उन्हें पट्टियों के सहारे जोड़कर काम चलाया जा रहा है।
ताजा मामला अस्पताल के डायलिसिस वार्ड के पास देखने को मिला, जहां डायलिसिस के लिए आए गंभीर मरीजों और उनके परिजनों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। एक मरीज के परिजन ने अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि वे काफी देर से अस्पताल के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें अपने मरीज को अंदर ले जाने के लिए न तो स्ट्रेचर मिला और न ही कोई सही स्थिति वाली व्हीलचेयर। अस्पताल के बाहर जो व्हीलचेयर पड़ी थीं, उनके फुट-रेस्ट (पैर रखने की जगह) गायब थे और उन्हें मेडिकल पट्टियों से बांधकर जुगाड़ के सहारे चलाया जा रहा था। ऐसी स्थिति में गंभीर रूप से बीमार मरीज को व्हीलचेयर पर बिठाना भी जोखिम भरा साबित हो रहा है।
मरीजों के परिजनों का कहना है कि डायलिसिस सेंटर के पास का मुख्य दरवाजा अक्सर बंद रहता है, जिससे उन्हें दूसरे गेट से लंबा चक्कर काटकर आना पड़ता है। अस्पताल के सुरक्षा गार्ड और कर्मचारी भी इस समस्या के प्रति उदासीन नजर आए। आधे घंटे से ज्यादा समय तक परिजनों के इधर-उधर भटकने और मीडिया की मौजूदगी के बाद ही अस्पताल प्रबंधन की ओर से एक व्हीलचेयर उपलब्ध कराई जा सकी। यह पहली बार नहीं है जब इस अस्पताल में स्ट्रेचर और व्हीलचेयर की कमी की बात सामने आई हो; इससे पहले भी कई बार घायलों को इलाज के लिए समय पर सहायता न मिलने की शिकायतें आती रही हैं।
अस्पताल की इस लचर व्यवस्था ने स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ जहां सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश के बड़े मेडिकल कॉलेज में बुनियादी उपकरणों का टूटा-फूटा होना इन दावों की हकीकत बयां करता है। अस्पताल प्रबंधन से बार-बार अपील की जा रही है कि वे मरीजों की समस्याओं की ओर ध्यान दें और जर्जर हो चुके उपकरणों को तुरंत बदलें ताकि लाचार मरीजों को और अधिक कष्ट न उठाना पड़े। फिलहाल, अस्पताल प्रशासन की ओर से इस मामले में कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं आया है।