सरकारी राजस्व को चूना लगाने वाले सफेदपोश अधिकारियों और व्यापारियों के गठजोड़ पर एक बार फिर प्रहार हुआ है। करनाल की घरौंडा अनाज मंडी में हुए तीन साल पुराने धान घोटाले की जांच को आगे बढ़ाते हुए एंटी करप्शन ब्यूरो (विजिलेंस) ने एक बड़ी एफआईआर दर्ज की है। इस कार्रवाई ने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है क्योंकि इसमें न केवल मंडी अधिकारी शामिल हैं, बल्कि क्षेत्र के बड़े राइस मिलर्स के नाम भी सामने आए हैं।
विजिलेंस द्वारा दर्ज की गई इस नई प्राथमिकी में भ्रष्टाचार निरोधक कानून (प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट) के साथ-साथ धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश रचने जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। इस मामले की गहराई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें आईपीसी की धारा 120-बी, 409, 420, 467, 468 और 471 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। यह कार्रवाई उस समय हुई है जब मौजूदा सत्र के धान घोटाले की जांच पहले से ही जारी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी पुरानी और गहरी हैं।
जिन सात लोगों के खिलाफ यह मामला दर्ज किया गया है, उनमें घरौंडा अनाज मंडी के तत्कालीन सचिव नरेश मान और खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के तत्कालीन इंस्पेक्टर संदीप कुमार मुख्य रूप से शामिल हैं। इन अधिकारियों के साथ पांच प्रमुख राइस मिलों—मेसर्स सुखदेव एंड कंपनी, रिद्धि सिद्धि ओवरसीज, गिरिराज ओवरसीज, नंदलाल ओवरसीज और लक्ष्मी राइस मिल के मालिकों को भी आरोपी बनाया गया है। इन सभी पर सरकारी अनाज की आवक और उठान में बड़े पैमाने पर कागजी हेराफेरी करने का आरोप है।
इस घोटाले का जो तरीका सामने आया है, वह न केवल हैरान करने वाला है बल्कि तंत्र की खामियों को भी उजागर करता है। जांच में पता चला है कि धान की ढुलाई के लिए कागजों पर जिन वाहनों के नंबर दर्ज किए गए थे, वे वास्तव में मोटरसाइकिल और स्कूटरों के थे। तकनीकी रूप से यह असंभव है कि दोपहिया वाहनों पर सैकड़ों क्विंटल धान की ढुलाई की जाए, लेकिन अधिकारियों की मिलीभगत से फर्जी गेट पास जारी किए गए और कागजों में धान की सप्लाई दिखा दी गई। जीपीएस और परिवहन रिकॉर्ड की बारीकी से जांच करने पर यह सारा खेल पकड़ में आया है।
एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर तीन साल पुराने मामले में अब जाकर कार्रवाई क्यों हुई? जांच के लंबे समय तक खिंचने और एफआईआर दर्ज होने में हुई देरी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, माना जा रहा है कि विजिलेंस के वर्तमान विशेष अभियान के तहत लंबित जांचों को तेजी से निपटाने के निर्देश दिए गए हैं, जिसके कारण ये पुरानी फाइलें दोबारा खुली हैं।
अनाज मंडियों में होने वाले ये घोटाले केवल आंकड़ों की बाजीगरी नहीं हैं, बल्कि यह उस अनाज पर डाका है जो गरीबों के निवाले के लिए आरक्षित होता है। करोड़ों रुपये का यह चूना सरकारी खजाने को लगाया गया है। हालांकि एफआईआर दर्ज हो चुकी है, लेकिन अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इन भ्रष्टाचारी ‘मगरमच्छों’ की गिरफ्तारी भी होगी या मामला केवल कागजी कार्रवाई तक ही सीमित रहेगा।
आप देख सकते हैं कि पिछले कुछ समय में करनाल के तरावड़ी, असंध और घरौंडा जैसे क्षेत्रों में लगातार ऐसे मामले सामने आए हैं। यह जरूरी है कि इस पूरे तंत्र की सफाई की जाए ताकि भविष्य में किसानों और आम जनता के हक पर कोई डाका न डाल सके। प्रशासन को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि दोषियों को कड़ी सजा मिले ताकि अन्य भ्रष्ट तत्वों को कड़ा संदेश जाए।