हरियाणा के करनाल जिले में इन दिनों कमर्शियल गैस सिलेंडरों की भारी किल्लत ने व्यापारियों और छोटे दुकानदारों की कमर तोड़ दी है। विशेष रूप से खाने-पीने का सामान बेचने वाले हलवाई और रेहड़ी-फड़ी वाले इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि जो दुकानदार अब तक आधुनिक गैस चूल्हों पर अपना काम करते थे, वे अब पुरानी पद्धति अपनाते हुए कोयले और लकड़ी की भट्टी जलाने पर मजबूर हैं। इस बदलाव ने न केवल उनके काम करने के तरीके को प्रभावित किया है, बल्कि उनकी शारीरिक और मानसिक परेशानियों को भी बढ़ा दिया है।
शहर के एक प्रसिद्ध समोसा विक्रेता भारत तनेजा ने अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि बाजार में कमर्शियल गैस सिलेंडर मिलना लगभग असंभव हो गया है। घरेलू सिलेंडर का उपयोग वे व्यावसायिक कार्यों के लिए कर नहीं सकते और कमर्शियल सिलेंडर उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में उन्होंने मजबूरी में एक नई कोयले की भट्टी खरीदी है। भारत के अनुसार, गैस चूल्हा जलाना बहुत आसान होता है, जिसे एक बटन दबाकर नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन कोयले की भट्टी तैयार करने में ही कम से कम एक घंटा लग जाता है। लकड़ी और कोयला इकट्ठा करना और फिर धुआं सहते हुए घंटों काम करना किसी चुनौती से कम नहीं है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि नई पीढ़ी को भट्टी जलाना तक नहीं आता, जिसके कारण शुरुआती दिनों में उनकी आंखों में धुएं के कारण इतने आंसू आए जितने शायद जीवन के किसी और दुख में नहीं आए होंगे।
व्यापारियों का आरोप है कि बाजार में सिलेंडरों की यह कमी कृत्रिम भी हो सकती है, क्योंकि कालाबाजारी करने वाले लोग सक्रिय हैं। जहाँ पहले एक कमर्शियल सिलेंडर 1800 से 1900 रुपये में आसानी से मिल जाता था, वहीं अब इसके लिए 4000 से 5000 रुपये तक मांगे जा रहे हैं। कई छोटे व्यापारियों ने तो इस किल्लत और ऊंचे दामों के डर से अपनी दुकानें और रेहड़ियाँ लगाना ही बंद कर दिया है। व्यापारियों का कहना है कि यदि उन्हें इतने ऊंचे दामों पर ईंधन खरीदना पड़ा, तो उनके लिए दुकान चलाना घाटे का सौदा साबित होगा।
हैरानी की बात यह है कि ईंधन की कीमतों और किल्लत के बावजूद कई दुकानदारों ने अभी तक अपने उत्पादों के दाम नहीं बढ़ाए हैं। उदाहरण के तौर पर, समोसे अभी भी पुरानी कीमत पर ही बेचे जा रहे हैं। हालांकि, व्यापारियों का कहना है कि वे अपनी जेब से कब तक इस घाटे को सहेंगे। यदि सरकार और प्रशासन ने जल्द ही आपूर्ति सुचारू नहीं की, तो वे खाने-पीने की वस्तुओं के दाम बढ़ाने पर मजबूर होंगे, जिसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा।
व्यापारियों के बीच इस बात को लेकर भी चर्चा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे तनाव और युद्ध की स्थितियों का असर ईंधन की आपूर्ति पर पड़ रहा है। उन्हें डर है कि आने वाले समय में पेट्रोल, डीजल और अन्य तेलों की कीमतों में भी भारी वृद्धि हो सकती है। करनाल के बाजारों में इस समय अनिश्चितता का माहौल है। बड़े व्यापारियों का मानना है कि कुछ लोग स्टॉक जमा करके कालाबाजारी को बढ़ावा दे रहे हैं, जिस पर प्रशासन को सख्त नकेल कसनी चाहिए। एक औसत दुकान में महीने में 15 से 20 सिलेंडरों की खपत होती है, और यदि प्रति सिलेंडर हजारों रुपये अतिरिक्त देने पड़े, तो व्यापार पूरी तरह ठप हो सकता है।
फिलहाल, व्यापारी किसी चमत्कार की उम्मीद कर रहे हैं ताकि गैस की आपूर्ति फिर से सामान्य हो सके। तब तक, उन्हें धुएं और कोयले की तपिश के बीच अपना गुजर-बसर करना होगा। इस संकट ने न केवल व्यापारिक मुनाफे को प्रभावित किया है, बल्कि आम आदमी के दैनिक जीवन और खान-पान की आदतों पर भी सवालिया निशान लगा दिया है। प्रशासन की ओर से अभी तक इस किल्लत को लेकर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण या राहत की घोषणा नहीं की गई है, जिससे व्यापारियों में रोष बढ़ता जा रहा है।
Ground Report By Deepali Dhiman