February 27, 2026
27 Feb 10
  • 50 वर्षों तक गरीबों का मुफ्त इलाज करने वाले 82 वर्षीय डॉक्टर हरकिशन ने अस्पताल में अंतिम सांस ली।
  • बंद कमरे में नरकीय जीवन जीने के बाद ‘अपना आशियाना’ आश्रम ने किया था रेस्क्यू; शरीर पर थे गहरे जख्म।
  • पत्नी और बच्चे ऑस्ट्रेलिया में बसे; अकेलेपन और इलाज के अभाव में बिगड़ी थी सेहत।

करनाल से एक अत्यंत हृदयविदारक घटना सामने आई है, जहां जीवन भर दूसरों का इलाज करने वाले और समाज सेवा में अपनी पूरी जिंदगी खपाने वाले 82 वर्षीय डॉक्टर हरकिशन का देहांत हो गया। यह मृत्यु केवल उम्र के कारण नहीं, बल्कि अपनों की बेरुखी और अकेलेपन की भेंट चढ़ गई। कुछ ही दिन पहले ‘अपना आशियाना’ आश्रम की संस्था ने उन्हें करनाल के मीरा घाटी स्थित उनके घर के एक बंद कमरे से बदतर हालत में रेस्क्यू किया था, लेकिन तमाम कोशिशों और दवाओं के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज में उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।

डॉक्टर हरकिशन की कहानी उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है, जहां बच्चे विदेश में बस जाते हैं और पीछे छूट गए माता-पिता तिल-तिल कर मरने को मजबूर होते हैं। डॉक्टर हरकिशन पिछले कई सालों से अपने घर में अकेले रह रहे थे। उनकी पत्नी और दो बेटियां ऑस्ट्रेलिया में बस चुकी हैं। बताया जा रहा है कि उनके और परिवार के बीच पिछले करीब 12-15 सालों से दूरी थी। वे अकेले ही अपना जीवन काट रहे थे, लेकिन पिछले कुछ महीनों में उनकी शारीरिक स्थिति इतनी बिगड़ गई कि वे बिस्तर से उठने लायक भी नहीं बचे थे। जब संस्था के लोग उन्हें बचाने पहुंचे थे, तब वे अपने ही मल-मूत्र के बीच नग्न अवस्था में मिले थे और उनके शरीर पर ‘बेड सोर’ (बिस्तर पर लेटे रहने से होने वाले गहरे जख्म) हो चुके थे।

आश्रम में लाने के बाद सेवादारों ने उनकी स्थिति सुधारने के लिए दिन-रात एक कर दिया था। उन्हें नहलाया गया, साफ कपड़े दिए गए और उचित भोजन व उपचार शुरू किया गया। शुरुआती कुछ दिनों में उनकी सेहत में सुधार के संकेत भी दिखे थे। वे चाय और बिस्कुट खुद अपने हाथों से ले रहे थे और वहां मौजूद लोगों से बात भी कर रहे थे। हालांकि, वे मानसिक रूप से काफी आहत थे और अक्सर अपने पुराने दिनों और दोस्तों को याद कर भावुक हो जाते थे।

दुर्भाग्यवश, उनकी सेहत में गिरावट तब शुरू हुई जब कुछ दिन पहले वे अपने घर में गिर गए थे और उन्हें गंभीर चोटें आई थीं। उस वक्त उन्हें किसी केयरटेकर या परिवार के सदस्य की सख्त जरूरत थी, लेकिन घर में कोई मौजूद नहीं था। आश्रम के सदस्यों ने बताया कि आज सुबह उनका बीपी काफी कम हो गया था। डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें कॉफी दी गई और वे कुछ समय के लिए ठीक भी महसूस कर रहे थे, लेकिन दोपहर होते-होते उनकी स्थिति अचानक बिगड़ गई। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों की पूरी टीम ने उन्हें बचाने का प्रयास किया, लेकिन वे कार्डियक अरेस्ट या शरीर की कमजोरी के कारण रिकवर नहीं कर पाए।

डॉक्टर हरकिशन के निधन की खबर मिलते ही उनके पुराने जानकार और सेवादार अस्पताल पहुंचे। वे बताते हैं कि डॉक्टर साहब एक संत प्रवृत्ति के इंसान थे, जिन्होंने करनाल के विभिन्न गुरुद्वारों और मंदिरों में दशकों तक मुफ्त दवाइयां दीं। वे नब्ज देखकर बीमारी बता देने के माहिर थे। उनके निधन ने उन सभी को झकझोर कर रख दिया है जिन्होंने उन्हें बदहाली से उबरते हुए देखने की दुआ की थी।

यह घटना उन सभी परिवारों के लिए एक बड़ी सीख है जिनके बच्चे विदेशों में सैटल हो चुके हैं। संस्था के सदस्यों ने मार्मिक अपील करते हुए कहा कि पैसा कमाना जरूरी है, लेकिन अपने मां-बाप को इस तरह बेसहारा छोड़ देना अमानवीय है। आज के समय में 20-25 हजार रुपये में एक केयरटेकर रखा जा सकता है जो बुजुर्गों की देखभाल कर सके, लेकिन डॉक्टर हरकिशन के मामले में वह भी नसीब नहीं हुआ। उनकी मृत्यु ने समाज के उस खोखलेपन को फिर से उजागर कर दिया है जहाँ रिश्तों से ऊपर भौतिक सुख-सुविधाओं को रखा जाता है। अब उनकी अंतिम इच्छा और परिवार की राय के अनुसार उनके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.