February 26, 2026
26 Feb 14

समाज में रिश्तों के खोखलेपन और बुजुर्गों की अनदेखी की एक हृदयविदारक घटना सामने आई है। जिस व्यक्ति ने अपने जीवन के 50 स्वर्णिम वर्ष दूसरों के इलाज और निस्वार्थ सेवा में समर्पित कर दिए, उसे अपनों की ही बेरुखी के कारण नरकीय जीवन जीने को मजबूर होना पड़ा। करनाल के प्रसिद्ध होम्योपैथी चिकित्सक डॉक्टर हरकिशन, जिन्होंने अपनी आधी सदी लोगों को दर्द से निजात दिलाने में बिताई, स्वयं अपनों के दिए गहरे घावों और अकेलेपन से जूझ रहे थे।

डॉक्टर हरकिशन करनाल के मीरा घाटी क्षेत्र में एक बंद कमरे में अत्यंत दयनीय स्थिति में मिले। सूचना मिलने पर ‘अपना आशियाना’ आश्रम की टीम जब उन्हें रेस्क्यू करने पहुंची, तो वहां का दृश्य विचलित करने वाला था। 82 वर्ष की आयु में, शरीर से अशक्त हो चुके डॉक्टर साहब एक बिस्तर पर लाचार पड़े थे। स्थिति इतनी गंभीर थी कि वे स्वयं उठने या अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में भी सक्षम नहीं थे। कई दिनों तक न नहाने और अस्वच्छ वातावरण में रहने के कारण उनकी शारीरिक स्थिति नाजुक बनी हुई थी।

विगत वर्षों का इतिहास देखें तो डॉक्टर हरकिशन केवल एक चिकित्सक नहीं, बल्कि करनाल की एक सम्मानित शख्सियत रहे हैं। उन्होंने अग्रवाल धर्मशाला, निर्मल धाम और कृष्णा मंदिर जैसी प्रमुख संस्थाओं में दशकों तक निशुल्क या नाममात्र शुल्क पर सेवाएं दीं। वे अपनी कला में इतने माहिर थे कि महज नब्ज देखकर ही मरीज की बीमारी और उसका सटीक इलाज बता देते थे। आज भी वे उन जटिल मामलों को याद करते हैं जहाँ पीजीआई जैसे संस्थानों से जवाब मिलने के बाद भी उनकी दवाइयों ने चमत्कार किया और लोगों को नई रोशनी दी।

विडंबना यह है कि जिस डॉक्टर का परिवार खुशहाल और आर्थिक रूप से संपन्न है, उन्हें इस उम्र में ₹3000 की मामूली पेंशन के भरोसे रहना पड़ रहा था। उनकी पत्नी और दोनों बेटियाँ पिछले कई वर्षों से ऑस्ट्रेलिया में रह रही हैं। बताया जा रहा है कि पारिवारिक विवाद और आपसी तालमेल की कमी के कारण डॉक्टर साहब अकेले रह गए। जब उन्हें मदद और अपनों के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब वे एक बंद कमरे में घुट-घुट कर जीने को विवश थे। आश्रम की टीम के अनुसार, जब उन्हें बचाने का प्रयास किया गया, तो निराशा के चरम पर पहुँच चुके डॉक्टर ने यहाँ तक कह दिया था कि उन्हें उनके हाल पर ही छोड़ दिया जाए।

रेस्क्यू के बाद अब डॉक्टर हरकिशन सुरक्षित हाथों में हैं। ‘अपना आशियाना’ आश्रम में उन्हें नहला-धुलाकर नए वस्त्र पहनाए गए और उनका उचित उपचार शुरू किया गया है। आश्रम के सेवादारों का कहना है कि वे उन्हें एक पिता समान सम्मान और स्नेह दे रहे हैं। अब उनकी सेहत में सुधार है और वे धीरे-धीरे बातचीत भी करने लगे हैं। किताबों के शौकीन डॉक्टर साहब आज भी चिकित्सा पद्धतियों और होम्योपैथी की गहरी समझ रखते हैं। उनकी इस हालत ने समाज के सामने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं, विशेषकर उन संतानों के लिए जो विदेश की चमक-धमक में अपने उन माता-पिता को भूल जाते हैं जिन्होंने उन्हें इस काबिल बनाया।

आश्रम प्रबंधन ने उनके परिवार से संपर्क करने की अपील की है ताकि वे अपने पिता की इस अवस्था को देख सकें और अपनी जिम्मेदारी समझें। फिलहाल, डॉक्टर साहब के चेहरे पर अब थोड़ी शांति है, क्योंकि वे अब एक ऐसे परिवार के बीच हैं जो खून का न होते हुए भी उनकी निस्वार्थ सेवा कर रहा है।

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