हरियाणा के पानीपत जिले से मानवता और सेवा की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जिसने समाज को अंगदान और देहदान के प्रति जागरूक करने का बड़ा संदेश दिया है। देशराज कॉलोनी की रहने वाली 60 वर्षीय प्रीति, जिन्हें घर में प्यार से धन्नो पुकारा जाता था, के आकस्मिक निधन के बाद उनके परिवार ने उनकी अंतिम इच्छानुसार पार्थिव शरीर को चिकित्सा शोध के लिए दान कर दिया।
हृदय विदारक किंतु गर्व करने वाली बात यह है कि इस परिवार में देहदान की यह परंपरा नई नहीं है। मात्र छह महीने पहले प्रीति के पिता का निधन हुआ था और उन्होंने भी अपना शरीर मेडिकल रिसर्च के लिए दान किया था। पिता के इस नेक कार्य से प्रेरित होकर प्रीति ने भी संकल्प लिया था कि मृत्यु के पश्चात उनका शरीर मिट्टी में मिलने या जलने के बजाय भावी डॉक्टरों की पढ़ाई के काम आए।
बुधवार को जब प्रीति का प्राकृतिक रूप से निधन हुआ, तो उनके बेटों और पति इंद्र जी ने शोक की घड़ी में भी धैर्य दिखाया और अपनी माता की अंतिम इच्छा को सम्मान देते हुए ‘अपना आशियाना आश्रम’ और ‘जन सेवा दल’ के माध्यम से कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज से संपर्क किया। देहदान की प्रक्रिया पूरी करने से पहले प्रीति के नेत्रों का दान भी किया गया, जिससे दो नेत्रहीन व्यक्तियों को नई रोशनी मिल सकेगी।
कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज के डायरेक्टर डॉ. रवीश अग्रवाल ने शव को स्वीकार करते हुए परिवार के इस साहसी और मानवतावादी कदम की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों (MBBS और MD स्टूडेंट्स) के लिए मानव शरीर पर अभ्यास करना अत्यंत आवश्यक होता है। ऐसे महादान से न केवल डॉक्टर तैयार होते हैं, बल्कि चिकित्सा के क्षेत्र में नई तकनीकों और बीमारियों के शोध में भी बड़ी मदद मिलती है।
समाजसेवियों ने इस अवसर पर आम जन से अपील की कि वे पुरानी रूढ़ियों को तोड़कर अंगदान और देहदान की दिशा में आगे आएं। “जीते-जीते रक्तदान, जाते-जाते नेत्रदान और संभव हो तो देहदान” का मंत्र समाज को एक नई दिशा दे सकता है। प्रीति का बलिदान न केवल चिकित्सा जगत के लिए अमूल्य है, बल्कि यह उन हजारों लोगों के लिए प्रेरणा है जो मरणोपरांत भी अमर होना चाहते हैं।