करनाल में स्वास्थ्य विभाग और पुलिस प्रशासन के बीच उपजा तनाव अब आम जनता के लिए भारी मुसीबत बन गया है। एसएचओ और एक डॉक्टर के बीच हुई कथित मारपीट के मामले ने इतना तूल पकड़ लिया है कि डॉक्टरों ने सामूहिक रूप से हड़ताल का रास्ता अख्तियार कर लिया है। इस प्रशासनिक खींचतान और ईगो की लड़ाई में सबसे ज्यादा वह गरीब तबका पिस रहा है, जो अपनी छोटी-बड़ी बीमारियों के इलाज के लिए पूरी तरह सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं पर निर्भर है।
अस्पताल परिसर में सन्नाटा पसरा हुआ है और ओपीडी (बाह्य रोगी विभाग) के बाहर ताले लटके हैं। दूर-दराज के गांवों और पड़ोसी जिलों से आए सैकड़ों मरीज सुबह से ही लाइनों में खड़े थे, लेकिन उन्हें इलाज के बजाय केवल निराशा हाथ लगी। अस्पताल के मुख्य द्वारों और सूचना पट्टों पर ‘हड़ताल के कारण अस्पताल बंद है’ के नोटिस चस्पा कर दिए गए हैं। हालांकि डॉक्टरों ने मानवीय आधार पर इमरजेंसी सेवाओं को चालू रखा है, लेकिन सामान्य बीमारियों, रूटीन चेकअप और पुरानी बीमारियों की दवा लेने आए लोगों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई है।
मेरठ रोड और प्रेमनगर जैसे इलाकों से आए मरीजों ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि वे पिछले कई दिनों से चक्कर काट रहे हैं। कुछ मरीज ऐसे भी हैं जो अपनी दैनिक दिहाड़ी छोड़कर इलाज के लिए आते हैं, लेकिन यहां आकर उन्हें पता चलता है कि डॉक्टर और पुलिस के आपसी झगड़े की वजह से सेवाएं बंद हैं। एक महिला मरीज ने बताया कि उनके लिए एक-एक दिन कीमती है क्योंकि बीमारी के कारण उनकी तकलीफ लगातार बढ़ती जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर हड़ताल लंबी खिंचती है, तो उन जैसे गरीब लोग कहां जाएंगे? निजी अस्पतालों की भारी-भरकम फीस भरना उनके बस से बाहर है।
हड़ताल का असर केवल स्थानीय मरीजों पर ही नहीं, बल्कि 30 से 40 किलोमीटर दूर से आने वाले बुजुर्गों और बच्चों पर भी पड़ रहा है। कई बुजुर्ग अपनी पेंशन और बचत के पैसों से किराया लगाकर अस्पताल पहुंचे थे, लेकिन गेट से ही उन्हें वापस भेज दिया गया। मरीजों का कहना है कि डॉक्टरों को अपनी मांगें मनवाने के लिए विरोध का कोई दूसरा तरीका अपनाना चाहिए, जिसमें मरीजों की जान जोखिम में न पड़े। अस्पताल में इलाज न मिलने के कारण कई लोग अब झोलाछाप डॉक्टरों या महंगे निजी क्लीनिकों की ओर रुख करने को मजबूर हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और बिगड़ रही है।
प्रशासनिक स्तर पर इस गतिरोध को खत्म करने के प्रयास अभी तक बेअसर साबित हुए हैं। डॉक्टर संगठन की मांग है कि एसएचओ के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, जबकि पुलिस पक्ष का अपना तर्क है। इस बीच, अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि वे स्थिति को सामान्य करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जब तक डॉक्टरों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित नहीं होता, तब तक पूर्ण कार्यबहाली मुश्किल नजर आ रही है। फिलहाल, अस्पताल की ओपीडी बंद रहने से स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है और जनता की उम्मीदें अब सरकार के हस्तक्षेप पर टिकी हैं।