यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) द्वारा लाए गए नए ‘यूजीसी एक्ट 2026’ ने देश भर के शैक्षणिक संस्थानों और कानूनी गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। जहाँ सरकार और यूजीसी का दावा है कि यह कानून उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता, समावेशिता और भेदभाव विरोधी व्यवहार को बढ़ावा देगा, वहीं कानूनी विशेषज्ञों और छात्रों का एक बड़ा वर्ग इसे भविष्य के लिए चुनौतीपूर्ण और विभाजनकारी मान रहा है।
वरिष्ठ अधिवक्ता वीरेंद्र राठौड़ ने इस कानून के कानूनी और सामाजिक पहलुओं पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार, इस एक्ट में ‘एक्सप्लसिट’ (स्पष्ट) और ‘इंप्लाइड’ (निहित या महसूस किया गया) भेदभाव जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। समस्या ‘इंप्लाइड’ शब्द के साथ है, जहाँ यदि कोई छात्र केवल यह महसूस करता है कि उसके साथ भेदभाव हुआ है, तो वह शिकायत दर्ज करा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी व्यक्तिपरक परिभाषा का दुरुपयोग हो सकता है और यह कैंपस के भीतर छात्रों के बीच अविश्वास और द्वेष की भावना पैदा कर सकता है।
कानूनी दृष्टिकोण से, इस एक्ट को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 16 (अवसर की समानता) के विपरीत बताया जा रहा है। यह कानून विशेष रूप से एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों के लिए सुरक्षा कवच की बात करता है, लेकिन विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि यह कानून सभी जातियों और वर्गों के छात्रों के लिए समान रूप से लागू होता, तो यह अधिक न्यायसंगत होता। कुछ चुनिंदा वर्गों को शामिल करना और दूसरों को छोड़ना संवैधानिक रूप से भेदभावपूर्ण माना जा सकता है।
नए नियमों के तहत हर कॉलेज में ‘इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर’ और ‘इक्विटी कमेटी’ का गठन अनिवार्य होगा। यदि किसी शिकायत का समाधान 15 दिनों के भीतर नहीं किया जाता, तो यूजीसी उस संस्थान की मान्यता रद्द करने या उसकी ग्रांट रोकने जैसे कड़े कदम उठा सकता है। जानकारों का कहना है कि इतने कम समय में जाँच पूरी करने का दबाव संस्थानों पर होगा, जिससे जल्दबाजी में गलत फैसले लिए जा सकते हैं, जो निर्दोष छात्रों के करियर को तबाह कर सकते हैं।
सोशल मीडिया पर भी इस एक्ट को लेकर ‘जेन-जी’ (Gen-Z) पीढ़ी के छात्रों के बीच भारी आक्रोश और विरोधाभास देखा जा रहा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि इन नियमों को बिना व्यापक चर्चा और संवैधानिक सुधारों के लागू किया गया, तो यह कैंपसों में शांति के बजाय वैमनस्य और हिंसा को जन्म दे सकता है। फिलहाल, इस एक्ट को भविष्य में अदालती चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है