रमाना-रमानी गांव के किसानो के लिए रेन वाटर हार्वेस्टर सिस्टम बना वरदान, दूसरे किसान भी इसे अपनाने की राह पर – तेजिन्द्र सिंह तेजी।

0
ramana-ramani-water-harvesting-technique-by-farmer
Advertisement

बारिश के पानी से उत्पन्न जल भराव की समस्या से निपटने के लिए जिला के तरावड़ी क्षेत्र में पडऩे वाले कई गांवो के दर्जनो किसानो ने आखिर समस्या का समाधान ढूंढ कर अपनी खेती को नष्ट होने से बचा लिया है। इसके लिए किसानो ने अपने खेतो में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को स्थापित किया है। जल पुर्नभरण की दिशा में यह एक बड़ा कदम है।

रमाना-रमानी गांव के किसान प्रशांत कुमार, नरेन्द्र काम्बोज तथा भजन लाल काम्बोज ने अपने खेतो में रेन वाटर हार्वेस्टर लगाकर दूसरे किसानो को राह दिखाने का काम किया है और अब हालात यह है कि वर्षों से चली आ रही जल भराव की समस्या से निपटने के लिए दूसरे किसानो ने भी इस सिस्टम को अपनाने की तरफ कदम बढ़ाएं हैं। वो दिन दूर नहीं जब इस क्षेत्र के किसानो की सोच के चलते पानी की बहुत बड़ी मात्रा को रिचार्ज करने में सफलता मिलेगी।

Advertisement


शुक्रवार को हरियाणा तालाब व अपशिष्ट जल प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य तेजिन्द्र सिंह तेजी के साथ रमाना गांव में एक भेंट के दौरान किसान प्रशांत कुमार ने खेतो में भरे पानी की समस्या का जिक्र करते हुए बताया कि मानसून सीजन में जब भारी बारिश हो जाती है, तो उनके पड़ोसी गांव पड़वाला की ओर से फ्लडिड वाटर खेतो के रास्ते बहकर हमारे गांव के खेतो में आ जाता था, जिससे हमारे लो-लाईन खेत पानी से लबालब हो जाते थे और धान की फसल खराब हो जाती थी।

एक अनुमान के अनुसार हर साल करीब 500 एकड़ धान की फसल का खराबा हो जाता था, लेकिन अब हमारे जैसे कुछ किसानो ने रेन वाटर को हार्वेस्ट करके अपनी फसलों को नुकसान से बचा लिया है। प्रशांत ने बताया कि सिस्टम के लिए एकमुश्त लगभग 60 हजार रूपये का खर्च आता है। इसमें 265 फुट नीचे तक बोर करके बरसाती पानी को एक पाईप के जरिए छोड़ा जाता है और यह बहुत ही सफल सिद्ध हुआ है।

किसान ने बताया कि तरावड़ी क्षेत्र ना केवल करनाल अपितु हरियाणा का बासमती धान का प्रमुख उत्पादक क्षेत्र है। यहां की बासमती वर्षों से विदेशों में निर्यात हो रही है। इसका कारण यहां की जमीन इस फसल के लिए बहुत ही उपयोगी है, जिस पर कृषि विशेषज्ञ वर्षों से अनुसंधान में लगे हैं। एक सवाल के जवाब में किसान ने बताया कि हालांकि वे और उन जैसे बहुत से किसान कृषि विविधिकरण को अपनाकर मक्का जैसी फसल लेना चाहते हैं, लेकिन दोनो फसलो में सम्भवत: मुनाफे के अंतर से ऐसा नहीं कर पा रहे हैं।

फिर भी एक ना एक दिना तो फसल विविधिकरण अपनाना ही पड़ेगा। इस पर तेजिन्द्र सिंह तेजी ने किसान को बताया कि हरियाणा सरकार ने निर्णय लिया है कि किसान पानी की बचत के लिए परम्परागत धान की खेती का विकल्प मक्का को अपनाएं। उनकी फसल की मार्किटिंग की जिम्मेवारी सरकार की रहेगी।

तरावड़ी क्षेत्र के प्रशांत कुमार, नरेन्द्र काम्बोज, भजन लाल व रमेश कुमार जैसे किसानो से प्रेरणा लेकर दूसरे किसानो को भी अपने खेतो में रेन वाटर हार्वेस्टर सिस्टम स्थापित करने चाहिए। इसमें एक बार के खर्च से भारी मात्रा में वर्षा के उस पानी को, जो बहकर या तो नदी-नालों में चला जाता है या फिर फसलों को नुकसान करता है, को बचाया जा सकता है। ऐसा करने से लगातार नीचे जा रहे भूमिगत जल स्तर का पुर्नभरण किया जा सकता है, जो आज के समय की मांग भी है।

Advertisement


LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.