दुखद है कि जंग जीत कर भी वार्ता की मेज पर हारा भारत

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हरियाणा ग्रंथ अकादमी के डिप्टी चेयरमैन और निदेशक प्रो. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा है कि 1971 की लड़ाई में भारतीय सेनान ने जो ज़ोरदार जीत हासिल की थी वह कई मायनों में ऐतिहासिक थी।  1971 में आज ही के दिन पूर्वी मोर्चे पर 93000 पाकिस्तानी सैनिकों ने उनके सेनापति लेफ्टिनेंट जनरल ए के नियाजी की अगुवाई में भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सम्मुख हथियार डाल कर आत्मसमर्पण  करना पड़ा था। सेना की इस बड़ी जीत को अगर राजनीतिक नेतृत्व शिमला समझौते की मेज पर कायदे से भुना पाता तो शायद कश्मीर की समस्या का समाधान उसी समय हो गया होता।प्रोफेसर चौहान विजय दिवस के अवसर पर नगला रोड़ान गांव के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में आयोजित एक विचार गोष्ठी को वेब कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संबोधित कर रहे थे

प्रो चौहान ने बताया कि  1971 की लड़ाई के फलस्वरूप जहां सेना ने पाकिस्तान को गहरा जख्म देते हुए उस के दो टुकडे कर डाले थे, वही पश्चिमी मोर्चे पर जम्मू-कश्मीर में उसका अवैध कब्जा भी समाप्त किया जा सकता था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भूमिका युद्ध के समय एक मजबूत प्रधानमंत्री की रही मगर युद्ध के बाद वार्ता की मेज पर बैठकर उन्होंने लड़ाई में हुए अधिकांश लाभ गंवा दिए। शिमला समझौते  के समय पाकिस्तान के सामने जम्मू कश्मीर का उसके अवैध कब्जे वाला गिलगित-बाल्टिस्तान और मीरपुर मुजफ्फराबाद क्षेत्र खाली करने  की शर्त रखी जा सकती थी। मगर ऐसा नहीं किया गया। इसलिए जब जब 1971 की जीत की चर्चा होगी तब तब वार्ता की मेज पर हुई हार का  विश्लेषण भी विशेषज्ञों द्वारा किया ही जाएगा।

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ग्रामोदय अभियान के संयोजक प्रोफेसर वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि  विजय दिवस 1971 की लड़ाई में शहीद हुए 3900 भारतीय सैनिकों को स्मरण कर श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर भी है। हुतात्मा शहीदों और उनके परिजनों के एहसान को हम कभी नहीं भुला सकते। विद्यार्थियों द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में चौहान ने कहा कि भारत की संसद द्वारा पारित एक प्रस्ताव के अनुसार भारत एक न एक दिन पाकिस्तान से उसके कब्जे वाले अपने क्षेत्र को आजाद अवश्य कर आएगा। ऐसे में महत्वपूर्ण बात यह भी है कि देश की नई पीढ़ी को इस बात का एहसास रहे कि भारत के राजनीतिक मानचित्र में जिस जम्मू कश्मीर राज्य को वे देखते हैं ,आज वह सारे का सारा तिरंगे की छाया में नहीं है। उसका एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान और कुछ भाग चीन के गैरकानूनी कब्जे में है।

प्रोफ़ेसर चौहान ने कहा कि विजय दिवस पर भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की याद भी अनायास ताजा हो उठती है। उन्होंने बताया कि सरदार वल्लभ भाई पटेल  की शुक्रवार को पुण्यतिथि थी और लौह पुरुष सरदार पटेल वह शख्सियत हैं जिन्होंने साढ़े पाँच सौ से अधिक राजे-रजवाड़ों की रियासतों को एकजुट करके भारत का वर्तमान स्वरूप तैयार करने में ऐतिहासिक भूमिका अदा की थी। उन्होंने कहा कि सरदार पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री बने होते तो देश आज जहां पर है, उससे कहीं बहुत आगे होता। उन्होंने विद्यार्थियों से 1971 की लड़ाई के बारे में विस्तार से अध्ययन करने और सरदार पटेल सरीखे महापुरुषों  की जीवनी भी पढ़ने का आवाहन किया।

कार्यक्रम के अंत में विद्यालय की प्राचार्य आशा रानी ने कार्यक्रम में विद्यार्थियों और शिक्षकों का मार्गदर्शन करने के लिए प्रो चौहान का आभार जताया। इस अवसर पर चांद वीर मलिक, सुरेंद्र सिंह मलिक, पूर्ण सिंह, कर्मवीर, रामनिवास, देवीदयाल, संजय शर्मा, आरती भाटिया, अवनीत कौर, संगीता, राकेश शर्मा, प्रेम सिंह व सुरेंद्र सिंह आदि अध्यापक मौजूद रहे।

 


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