आरसीईपी समझौता लागू हुआ तो 10 गुना बढ़ जायेगी किसान आत्महत्याएं : राजेन्द्र आर्य

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राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के बैनर पर लघु सचिवालय करनाल के मुख्य द्वार पर करनाल, कुरुक्षेत्र व पानीपत के दुग्ध उत्पादकों व किसानों ने रोष प्रदर्शन किया। विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के प्रदेश अध्यक्ष राजेन्द्र आर्य दादूपुर ने किया। इस अवसर पर किसानों ने आरसीईपी समझौते के विरोध में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पुतला दहन कर नारेबाजी की। किसान नेता राजेन्द्र आर्य ने कहा कि अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के आह्वान पर चार नवम्बर को देशभर में आरसीईपी समझौते का विरोध किया जा रहा है।

राजेन्द्र आर्य ने कहा कि मुक्त व्यापार संधि में भारत को शामिल करने के विरुद्ध सरकार को चेतावनी देने के लिए यह देशव्यापी विरोध प्रदर्शन है। सरकार की किसान विरोधी कारपोरेट पक्षधर नीतियों के कारण भारतीय किसान विश्व व्यापार में अपनी फसलें बेच पाने में कम सक्षम है। विश्व भर में सरकारें फसलों की लागत में भारी छूट देती है और अपने किसानों को खेती की अच्छी सुविधाएं प्रदान करती है, जिसकी वजह से उनकी उपज के दाम बाजार में प्रतियोगी बने रहते हैं। भारत में लागत पर इतना भारी कर लगाया जाता है और किसानों को लाभकारी मूल्य नहीं दिया जाता, इसीलिए किसान घाटे में रहते हैं और कर्जे से लदे रहते हैं।

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आरसीईपी समझौता लागू होने से किसान आत्महत्याओं की दर 10 गुना बढ़ जायेगी। आईसीईपी इस संकट को और गंंभीर बना देगा। इतने व्यापक प्रभाव वाले व्यापार समझौते को जो कि करोड़ों भारतीय किसानों की जीविका को प्रभावित कर देगा। एक पूर्ण गोपनीय समझौता किया जाना है लोकतंत्र का मजाक उड़ाना है। राजेन्द्र आर्य ने कहा कि इस समझौते का कोई प्रारूप जनावलोकन के लिए मौजूद नहीं है। राज्य सरकारों से भी सुझाव नहीं लिए गए हैं और संसद में भी इसकी चर्चा नहीं की गई है।

वाणिज्य मंत्री का यह कहना कि जब तक समझौता बाहर नहीं आता तब तक सभी को चुप्पी साधे रखनी चाहिए बेहद निदंनीय है। प्रधानमंत्री को समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले समझौते का प्रारूप सार्वजनिक करना चाहिए। किसान संगठनों, राज्य सरकारों व सभी प्रभावित पक्षकारों की राय लेकर ही अंतिम फैसला लेना चाहिए। डेयरी क्षेत्र पर इसका अभूतपूर्व प्रभाव पड़ेगा जैसा कि पिछले समझौतों से नहीं पड़ा है। पूर्व में यूरोपीयन यूनियन, कनाडा अमेरिका के साथ एफटीए वार्ता नाकाम होने की यही वजह रही कि उसमें डेयरी और कृषि क्षेत्रों को भारत सरकार इसमें शामिल नहीं करना चाहती थी।

आरसीईपी की सबसे बड़ी मार डेयरी सैक्टर यानि दुग्ध उत्पादकों पर पड़ेगी। फिलहाल भारत सरकार ने विदेश से दूध और दूध पाउडर के आयात पर 34 प्रतिशत शुल्क लगाकर दुग्ध उत्पादकों को बचाया हुआ है। लेकिन आरसीइपी लागू होने पर इस शुल्क को हटाना पड़ेगा। हैरानी की बात यह है कि 7 साल तक 26 राउंड की अधिकारिक चर्चा के बावजूद देश में अभी तक इस समझौते के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है। पिछले साल भी सभी देशों में समझौते के मुख्य अंशों को सार्वजनिक करने की बात उठी, तो भारत सरकार की जिद पर इसे गोपनीय रखा गया।

आरसीईपी भारत का पहला मुक्त व्यापार समझौता नहीं है। भारत पहले भी विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का सदस्य है और अब तक 42 मुक्त समझौते कर चुका है, इसके तहत कई देशों के साथ भारत का व्यापार शुल्क रहित होता है। लेकिन अब तक यह सब समझौते सीमित थे, डब्ल्यूटीओ में शामिल होने के बावजूद भारत सरकार ने कृषि उत्पाद और दुध आदि को मुक्त व्यापार से काफी हद तक बचाए रखा है। आरसीईपी पहला बड़ा मुक्त व्यापार समझौता होगा जिसका असर सीधे-सीधे किसानों पर पड़ेगा। इस समझौते से बाजार में फसलों के दाम और भी गिर जाएंगे।

श्रीलंका और दक्षिण पूर्वी एशिया से हुए मुक्त व्यापार समझौते के बाद काली मिर्च, इलायची, नारियल और रबड़ के किसान बर्बादी झेल चुके हैं, पॉम आयल के बड़े आयात की वजह से भारतीय बाजार में तिलहन के दाम गिरे हैं, मोजाम्बिक से दाल का आयात होने पर किसानों को होने वाला असर पहले ही देख चुके हैं। अब तक तो सरकार शुल्क बढ़ाकर इस आयात से किसानों को बचा सकती थी, लेकिन अब यह समझौता लागू होने के बाद सरकार के हाथ से यह अधिकार भी चला जायेगा। सरकार के इस फैसले से भारत के 10 करोड़ दूध उत्पादक और डेयरियां बर्बाद हो जाएंगी। शुल्क के घटने के अलावा और भी आशंकाएं हैं।

इस समझौते से बीज की कम्पनियों के पेटेंट की ताकत बढ़ जाएगी और इस तरह के समझौतो में मुकदमा विदेशी मंच पर होता है और खूफिया तरीके से चलता है। खतरा यह भी है कि इस समझौते से विदेशी कम्पनियों को हमारे यहां खेती की जमीन खरीदने का अधिकार मिलेगा। उन्हें फसल की सरकारी खरीद में भी हिस्सा लेने का मौका मिलेगा। पंजाब और केरल की सरकार ने औपचारिक रूप से केंद्र सरकार को लिखा है कि उन्हें चर्चा में शामिल किया जाए।

अमूल डेयरी सहित देश के अधिकांश सहकारी डेयरी संघ इस बारे में वाणिज्य मंत्री को मिलकर अपनी आशंकाएं जता चुके हैं। सभी शंकाओं के बावजूद भी अगर सरकार ने समझौते की शर्ते सार्वजनिक किए बिना व कृषि व डेयरी क्षेत्र को समझौते से बाहर रखे बिना समझौते पर हस्ताक्षर किए तो राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन पूरे प्रदेश में युद्ध स्तर पर आंदोलन चलायेगा।

इस अवसर पर कंवलप्रीत, कंवलजीत नेवल, प्रोग्रेसिव डेयरी फार्मर एसोसिएशन से नरेश बराना, प्रदीप आर्य बस्तली, परमाल सिंह अमुपूर सहित डेयरी व कृषि से जुड़े किसान उपस्थित रहे।

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